बच्चों से सीखाे हँसना, बच्चे हैं जग का गहना ये ताे हैं अनमाेल.... हो... दिल काे लुभाए इनके बोल।। (1) भेदभाव काे भूलकर, मिलकर रहना सिखाती है पल में रूठना पल में मिलना, हमकाे ये बतलाती है बच्चे हैं सबका ललना.... देवाें की है ये प्रतिमा, ये ताे है अनमाेल..... हो... दिल काे लुभाए इनके बोल।। (2) काैन है अपना काैन पराया, हाेता नही खब़र सबको अपने बीच समाले, इनकाे नही उज़र बोली है गुड़ की भेली.... बचपन की हँसी ठिठाेली, ये ताे है अनमाेल..... हो..... दिल काे लुभाए इनके बोल।। (3) द्वेष लोभ आैर द्रव्य दुश्मनी, इनकाे नही पता है ये सबके हैं इनके सब हैं, इनकी यही अदा है खिलती कलि ये बच्चे हैं.... तन-मन के ये सच्चे हैं ये ताे हैं अनमाेल..... हो..... दिल काे लुभाए इनके बोल।। याेगेश निर्मलकर ‘नाना’
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