आज बेटी हुई है परायी सही में, घर से जो निकलने को डरने लगी है।
कह ले इसे घर की लक्ष्मी भले ही, बनी द्रोपती ये सहमने लगी है।
कैसा चरित है समाज का आज, लंपट बने है पुरूष भेडि़यों के खाल में।
माँ की माथे में हैं चिंता की लकीरें, पिता का विश्वास डिगने लगा है दुनिया के चाल से।
सत्तासीन हुए है जो कुछ ठेकेदार, मुख से जहर वो उगलने लगे हैं।
ज्ञानी खुद को समझने लगे हैं ये लोग,दुष्कृत्यों के अर्थ ये बदलने लगे हैं।
जिनमें रखवाली की जिम्मे पड़ी है, आज वासना से वो नजरें गड़ाए खड़े हैं।
झूलती है फंदे से पेड़ों में बेटियाँ, न कायदा है कोई बेशरमी की परदा पड़े हैं।
जिस्मों की घाव भी देते दरिंदे, आत्मा को कुरेदे हैं पीड़ा जीवन भर का दे के।
सभ्यता का चादर ओढ़े खड़े लोग, घसीटे जैसे लाश जिंदा लाडली को मारके।
हैवानियत की हद में है, घृणा होती खुद से हर इंसान रोने लगा है।
कब विश्वास से जी सकेंगे, मेरे घर की शुकुँ भी खोने लगा है।

                                                       योगेश निर्मलकर 'नाना'                                                         
                                                        मोबा. 9770199268

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