कविता मैं क्या लिखूँ........
तुम खुद एक कविता हो तुझ पर कविता मैं क्या लिखूँ।
नखशिख तक जो तेजस है प्रेम का,
चितचोर ये मन फैलाए उजियारा।
जब मटकाती हो आंखें तो लगता है,
रस टपकती महुआ की मादकता।
जब तिरछी नैनो को फेरती हो,
तो लगता है हया चरम पर हो।
लजाती हो, रहती हो खुद को छुपाने की कोशिश में,
तुम्हारी गालों की कोमलता, बालों की चंचलता पर क्या लिखूँ।
तुम खुद एक कविता हो तुझ पर कविता मैं क्या लिखूँ।
तेरे होंठों की थरथराहट में, रख लूं अपनी लबों को,
पर सोचता हूँ क्या कहोगी मेरी इस हरकत पर।
तेरी हँसी की वो नाद गुँजती है मेरे कानों में अभी भी,
उन्मुक्त हो खिलखिलाती हो,
झूलती है अक्स तुम्हारा मेरी आंखों में अभी भी
तुम्हारी पलकों का यूँ झपकना
तुम्हारे माथे की बिंदिया पर क्या कहूँ।
तुम खुद एक कविता हो तुझ पर कविता मैं क्या लिखूँ।
झांकती है तुम्हारी कमर से स्वर्ण वदन की श्रृंखला,
ललचाती हो मुझका,े मेरी सब्र से क्यों खेलती हो।
चलती हो जब तो पैरों में पायल की घुंघरू छनकती है,
गाती है, सुरों की तान फिज़ा में छेड़ जाती है।
अधमरा कर चुकी हो मुझको, कोई तो इशारा करो,
कि मरने की ख्वाहिश़ में भी जीने की आस हो।
जिंदगी में साथ चलने की, जीने की,
जिंदगी के कुछ पल क्या तुम मुझे दोगी ?
तेरी बाहों का सहारा क्या तुम मुझे दोगी ?
बैठ सके शुकुँ से,
क्या तुम वो किनारा मुझे दोगी ?
तेरी खामोशियाँ, तेरी नादानियों पर मदमत्त रहूँ।
तुम खुद एक कविता हो तुझ पर कविता मैं क्या लिखूँ।
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