//----दारु के गोठ----//
जेती देखबे तेती दारू के हे महिमा
जे घर म दारू नइ हे तिहाँ
नइ जाए कोनो पहुना
दारू के गोठ सबो ल
बड़ गुरतुर सुहाथे
दू पइसा कमाके संग-संगवारी ल
चार पइसा के पियाथे
पियत रहा पियत रहा
हमर बाप के का जात हे
भले चिरहा फटहा लइका पहिरे
अउ गोसइन जइसन परे घर चलात हे
लड़ई झगरा अउ फूटहा कुंदरा
दारू देख मुंह चुचवाए लार
झूमत गिरत कहे जवान
हमर घर हमर दुवार
हम खाबो तीन जुवार
जिनगी म का हे
पीना हे तभे जीना हे
एक गोडि़या संग दू गोड़ के
चरबन समोना हे
खाए बर दाना नइ हे
पीए बर हे अंगरेजी माल
घर बार के इज्जत मान
नइए कोनो खियाल
दाना के पूरती होगे कम
कम होगे गंगा के धार
घरो-घर अउ गांव-गांव म
लगत हे दारू के बाजार
बाप ह पियत हे दारू
लइका ल मंगावत हे
सुवाद चिखे लइका सीखे
दारू के बोतल हलावत हे
सिरतोन कहात हंव एक दिन
दारू - दारू बर होही लड़ाई
बाप-बेटा, कका-भतीजा
एक दूसर के मांस भूंज
चीथ-चीथ के खाही।।
योगेश निर्मलकर 'नाना'
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