Posts

Showing posts from October, 2018
//.....दुनिया जीत लो.....// हो गर हौसले बुलंद, तो कभी मात नही होती क्योंकि बिन बादल, कभी बरसात नही होती दीपक का ऐसा अंदाज़ न था, हवा भी उसके साथ न था लगती कमियाँ ही थी उसके पास फिर भी वह निराश न था चिंगारी की बस धधकने की बारी है कि वह एक शोला बन जाए असंभव तो कुछ भी नही है कि जो उजास के लिए बला बन जाए जो जीतने की चाहत रखता है, और जीतता है उसे कायनात भी साथ देती है जज़्बा हो दिल में कुछ पाने की तो चाहत कदमों के पास होती है हँसने वाले तो है बहुत यहाँ पर थाम लिया उजाले का दामन तो रात नही होती जो हँसके जी गया जिंदगी को उसके लिए आंसु असफलता ही बात नही होती। - योगेश निर्मलकर ‘नाना’    मो0 - 9770199268
//----दारु के गोठ----// जेती देखबे तेती दारू के हे महिमा जे घर म दारू नइ हे तिहाँ नइ जाए कोनो पहुना दारू के गोठ सबो ल बड़ गुरतुर सुहाथे दू पइसा कमाके संग-संगवारी ल चार पइसा के पियाथे पियत रहा पियत रहा हमर बाप के का जात हे भले चिरहा फटहा लइका पहिरे अउ गोसइन जइसन परे घर चलात हे लड़ई झगरा अउ फूटहा कुंदरा दारू देख मुंह चुचवाए लार झूमत गिरत कहे जवान हमर घर हमर दुवार हम खाबो तीन जुवार जिनगी म का हे पीना हे तभे जीना हे एक गोडि़या संग दू गोड़ के चरबन समोना हे खाए बर दाना नइ हे पीए बर हे अंगरेजी माल घर बार के इज्जत मान नइए कोनो खियाल दाना के पूरती होगे कम कम होगे गंगा के धार घरो-घर अउ गांव-गांव म लगत हे दारू के बाजार बाप ह पियत हे दारू लइका ल मंगावत हे सुवाद चिखे लइका सीखे दारू के बोतल हलावत हे सिरतोन कहात हंव एक दिन दारू - दारू बर होही लड़ाई बाप-बेटा, कका-भतीजा एक दूसर के मांस भूंज चीथ-चीथ के खाही।।                                 योगेश निर्मलकर 'नाना'       ...
कविता मैं क्या लिखूँ........ तुम खुद एक कविता हो तुझ पर कविता मैं क्या लिखूँ। नखशिख तक जो तेजस है प्रेम का, चितचोर ये मन फैलाए उजियारा। जब मटकाती हो आंखें तो लगता है, रस टपकती महुआ की मादकता। जब तिरछी नैनो को फेरती हो, तो लगता है हया चरम पर हो। लजाती हो, रहती हो खुद को छुपाने की कोशिश में, तुम्हारी गालों की कोमलता, बालों की चंचलता पर क्या लिखूँ। तुम खुद एक कविता हो तुझ पर कविता मैं क्या लिखूँ। तेरे होंठों की थरथराहट में, रख लूं अपनी लबों को, पर सोचता हूँ क्या कहोगी मेरी इस हरकत पर। तेरी हँसी की वो नाद गुँजती है मेरे कानों में अभी भी, उन्मुक्त हो खिलखिलाती हो, झूलती है अक्स तुम्हारा मेरी आंखों में अभी भी तुम्हारी पलकों का यूँ झपकना तुम्हारे माथे की बिंदिया पर क्या कहूँ। तुम खुद एक कविता हो तुझ पर कविता मैं क्या लिखूँ। झांकती है तुम्हारी कमर से स्वर्ण वदन की श्रृंखला, ललचाती हो मुझका,े मेरी सब्र से क्यों खेलती हो। चलती हो जब तो पैरों में पायल की घुंघरू छनकती है, गाती है, सुरों की तान फिज़ा में छेड़ जाती है। अधमरा कर चुकी हो मुझको, कोई तो इश...
Image
आज बेटी हुई है परायी सही में, घर से जो निकलने को डरने लगी है। कह ले इसे घर की लक्ष्मी भले ही, बनी द्रोपती ये सहमने लगी है। कैसा चरित है समाज का आज, लंपट बने है पुरूष भेडि़यों के खाल में। माँ की माथे में हैं चिंता की लकीरें, पिता का विश्वास डिगने लगा है दुनिया के चाल से। सत्तासीन हुए है जो कुछ ठेकेदार, मुख से जहर वो उगलने लगे हैं। ज्ञानी खुद को समझने लगे हैं ये लोग,दुष्कृत्यों के अर्थ ये बदलने लगे हैं। जिनमें रखवाली की जिम्मे पड़ी है, आज वासना से वो नजरें गड़ाए खड़े हैं। झूलती है फंदे से पेड़ों में बेटियाँ, न कायदा है कोई बेशरमी की परदा पड़े हैं। जिस्मों की घाव भी देते दरिंदे, आत्मा को कुरेदे हैं पीड़ा जीवन भर का दे के। सभ्यता का चादर ओढ़े खड़े लोग, घसीटे जैसे लाश जिंदा लाडली को मारके। हैवानियत की हद में है, घृणा होती खुद से हर इंसान रोने लगा है। कब विश्वास से जी सकेंगे, मेरे घर की शुकुँ भी खोने लगा है।                                           ...
तेरे इश्क में...... खुशरंग इश्क में हम भी तो मरते चले गए। तेरे इश्क की दरिया में डूबते चले गए।। दुनिया में खूबसूरत है दिल का नज़राना। कम्ब़ख़्त इश्क़ में हम मिटते चले गए।। जमाने ने मेरा नाम रखा तू भी कुछ नाम रखदे। नाम मुझे मिल जाए ये दुआ करते चले गए।। गिज़ालों की तरह नाच उठता है मन। पर इज़्ाहार में ही वक्त बितते चले गए।। अनसुलझे पहेलियों की तरह खोया रहता हूँ। कुछ याद न रहा खुद को भी भूलते चले गए।। सौगात में प्यार कुछ उधार मांगते पर। सुखऱ् दीवारों से टकराकर हंसते चले गए।। ज़रा सा याद कर ले इस नाचीज़्ा को। मयस्सर होगी जन्नत इश्क की किताब पढ़ते चले गए।। जमाना भी बड़ा बेरहम है कि क्या बताऊँ। बेदम होकर भी और पीटते चले गए।। कबुल करके मेरे प्यार को इनायत करना। ‘नाना’ तो तेरे इंतज़ार में यूँ ही लूटते चले गए।।
धरती माँ के कोरा म..…. मोर धरती माँ के कोरा म फूल बगरा लौ रे डगर-डगर म बाट-बाट म, मया के दीया जला लौ रे (1) रूख-राई संग मितान बद लो, सुख-दुख के संगवारी ए हाथ पसार के मन म समा लौ, पुरखौति के चिन्हारी ए तुलसी, पीपर, बर अउ डूमर देवता एमा बसा लौ रे............... मोर धरती माँ के कोरा म।। (2) टूटथे-कटथे पीरा ल सहिथे तब ले तोर करा नवथे परलय-झंझा संताप ल दुख-पीरा ल हरथे घाम, पियास, बिपत बेरा म माटी के जतन ल कर लौ रे................... मोर धरती माँ के कोरा म।।
तोला देखे रेहेंव............ तोला देखे रेहेंव चैती, घर बनत रिहिस ते करा धमेला म गिट्टी डोहारे रहे एक हाथ में लइका पोटारे रहे गोसइया ले मार खाए रहे वो ठेकेदार के वासना के आंखी म तोला देखे रेहेंव।। तोला देखे रेहेंव चैती, एक ठन फूटहा कुंदरा म छेतका कुरिया म बइठे मया दुलार बर अइठे काहत गोसइया नइते सिसकत सुखावत तोला देखे रेहेंव।। तोला देखे रेहेंव चैती, तोर संगी के घर, तोर ससुराल म उहाँ सब ले मार खाते रेहे मइके ले पइसा मंगाते रेहे तभो ले माटी के तेल छिते रेहे सुक्खा लकड़ी कस जरत तोला देखे रेहेंव।। तोला देखे रेहेंव चैती, रस्दा म रेंगत अपन रद्दा जात रेहे लोगन के फबती मार खात रेहे अऊ गंगा धार आंसु बोहात रेहे दुनिया के अतेक भीड़ म अकेल्ला तोला देखे रेहेंव।। तोला देखे रेहेंव चैती, सबे अख़बार के पहली पन्ना म फोटो छपाय रिहिस तोर हाल ल बताए रिहिस कहानी ले तोर लोगन मजा उड़ाय रिहिस चिरहा फटहा लुगरा अंछरा म तोला देखे रेहेंव।। तोला देखे रेहेंव चैती, फूटहा करमलेखा के मार ले तोला देखे रेहेंव।। योगेश निर्मलकर 'नाना'
बढ़ते चलो-बढ़ते चलो समय को मुट्ठी में कौन कर सका, नदी की जलधारा सा बहो ।                   रुकना तेरा काम नही है                   अग्रसर हो पथ पर डटे रहो। मंजिल को पाना है तुम्हे, पर्वत सा अड़े रहो।                   लक्ष्य मिले देर ही सही,                   पर, मत तुम उदास हो। हो जाती हैै गलती कहीं पर, दूसरोें से नही खुद से कहो।                   हंसी का पात्र भी बनना पड़ेगा,                   ध्यान मत दे चलते रहो। राह में तेरी गहरी खाई है, उसको तुम लांघते चलो।                   गिरना नही उठना तुम्हे है,                   रास्ते में सो जाए कहीं ऐसा न हो। कहीं खुश...